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बोलने की स्वतंत्रता: क्या हमें इसे बदलने की आवश्यकता है?

हाल ही में मैंने एक मुस्लिम लड़की का वीडियो देखा, जिसने भारत की देवी और देवी को बुरा-भला कहा और यह इस वीडियो के बारे में नहीं है कि हम हर रोज लोगों को बुरी बातें कहते और सांप्रदायिकता को बढ़ाते हुए पाते हैं।

अनुच्छेद 19 के अनुसार, प्रत्येक नागरिक बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार है और भाव व्यक्त करने का अधिकार है लेकिन उचित प्रतिबंधों के अधीन संरक्षण के अंतर शालीनता और नैतिकता को बरकरार रखते हुए है।

अनुच्छेद 28 किसी भी शैक्षणिक संस्थान में किसी भी धार्मिक निर्देश को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित करता है, जिसे राज्य निधियों से बाहर रखा जाता है।

लेकिन क्या हम इसका सख्ती से पालन कर रहे हैं?

भारत में राजनीतिक प्रवचन ने हमेशा से ही आमंत्रित किया है सांप्रदायिकता पर बहस, नफरत और हिंसा को और बहुत से लोग इसपे घी डालते रहे है।

अक्सर हम देखते हैं कि लोग अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं, हर रोज हम उन पोस्टों और टिप्पणियों पर ध्यान देंगे जहां हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे को गाली दे रहे हैं।

एक तरफ, ऐसे लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाती है जो सांप्रदायिक वायरस फैला रहे हैं लेकिन हर रोज ऐसी मानसिकता रखने वाले लोग पनप रहे है।

इस तरह के सांप्रदायिक वायरस फैलाने में सोशल मीडिया का बड़ा योगदान है, ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य सोशल साइट्स पर केवल एक वीडियो बनाकर और संवेदनशील पोस्ट कर देते है सिर्फ केवल रातों-रात वायरल और प्रसिद्ध होने के लिए लेकिन उनके इरादे इतने खतरनाक हैं कि वे शांति और सद्भाव को खतरे में डालते हैं ।

भारत फेसबुक के लिए सबसे बड़ा बाजार है, लेकिन एक खतरा भी है क्योंकि आए दिन फेक न्यूज, पोस्ट्स शेअर होते रहते है। भारत सरकार द्वारा प्रौद्योगिकी कंपनियों को उनके प्लेटफार्मों पर दिखाई देने वाली सामग्री के लिए जवाबदेह रखने का प्रयास है – ऐसी सामग्री जो भ्रामक हो सकती है, भ्रम पैदा कर सकती है और यहां तक कि टी का नेतृत्व भी किया है।

हमें प्रतिबंधित करने की आवश्यकता है और कानून को और सख्त होना चाहिए ताकि लोग उन विचारों को व्यक्त करने से पहले हजार बार सोचें जो अन्य भावनाओं को चोट पहुंचा सकते हैं।

केवल एक सामान्य नागरिक के रूप से आइए हम अपने बारे में और अपने मन में घृणा की मात्रा के बारे में सोचें। कई राज्य दूसरे राज्य के लोगों से नफरत करते हैं, कई लोग प्रवासियों से नफरत करते हैं, हमारी जाति व्यवस्था आज भी कायम है।

हमारे घरों में ससुराल वाले अपनी बहू से घृणा करते हैं हमें लगता है कि ससुराल वालों को दुर्व्यवहार करने का अधिकार है। हम बस यह कहते हुए इस सब को अनदेखा कर देते हैं कि यह सामान्य है।

हम अब चीन से नफरत करते हैं, हम कहते हैं कि चीन एक साम्यवादी देश है लेकिन चीन में कोई भी इस तरह की मूर्खता करने की हिम्मत नहीं करता है। उनका कानून इतना सख्त है कि कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से ऐसा लिखने या बोलने की हिम्मत नहीं करेगा।

मेरा अनुरोध है कि हमें अपनी शक्तियों और स्वतंत्रता का बुद्धिमानी से उपयोग करना चाहिए। हमने सिर्फ एक उदाहरण देखा कि कैसे हम नागरिकों ने सरकार को सुशांत के मामले को गंभीरता से लेने के लिए मजबूर किया अब मैं चाहती हूं कि बुद्धिजीवी लोग उठकर आगे आये और नफरत को रोकें।

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भारत को छोटी सोच से आज़ादी कब मिलेगी?

हमने कभी गुलामी को अनुभव नहीं किया क्योंकि हम आज़ाद भारत में पैदा हुए है पर पल पल एक गुलामी महसूस कि है जो समाज कि जटिल प्रक्रिया ने समझाया है।

जहां एक और हम सबको पता है कि आज पूरी दुनिया कोरोना वायरस से लड़ रही है और हमारा देश उतार चढाव से आज भी जूझ रहा है।

एक तरफ जहां उभरते हुए एक कलाकार सुशांत सिंह राजपूत की मौत से सवाल उठते है निपोटिज्म पर तो दूसरी ओर हमारे न्याय व्यवस्था पर।

जहां राम मंदिर का निर्माण हुआ वहीं दूसरी ओर कहीं आग लगा दिया गया।

हम सभी जानते है कि देश करप्शन, गरीबी, सोशल इनिक्वालिटी, घरेलू हिंसा , असाक्षरता से पीड़ित हैं।

भारतीय समाज मुख्यतः पितृसत्तात्मक है पर ये केवल एक समस्या नई है में आज बात करना चाहती हूं हर घर में रोज होने वाली उन बातों को जिन्हें हम नजरंदाज कर देते है इसलिए कि हमें बात को बढावा नहीं देना ।

गलत ये नहीं है जब ये कहां जाए कि एक लड़की को ढंग के कपड़े पहने चाहिए पर कूटनीति और पाखंड तब होता है जब हम अपनी बेटी को बिकिनी पहनने कि भी अनुमति देते है और बहू को पल्लू करने बोलते है।

हमें ससुराल में कैसे रहना है इसकी सीख हम अपने बच्चों को देने से ज्यादा बहू को देना पसंद करते है।

माँ एक बहुत बड़ा शब्द होता है वो अपने बच्चे की हर संभव रक्षा करती है पर दूसरे घर से आई बेटी को अपमानित करती है और दूसरे घरवालों को भी बढ़ावा देती है वो गलत है साथ ही कहीं ना कहीं ये भी सच है कि एक औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है।

2020 में जीने वाले हमलोग सोच के मामले में आज भी 18 वीं सदी में जी रहे है।

अब हमें लड़की ऐसी चाहिए जो पढ़ी लिखी, सुन्दर और अच्छे घर से हो पर उसी के साथ गूंगी और बहरी भी होनी चाहिए।

रुढ़िवादी आज भी कायम है। छोटे शहरों और गांवों में पर्दा प्रथा का आज भी प्रचलन है। दूसरे की कामिया निकालना तो एक आम बात है पर अपनी कमिया नहीं दिखती। कहते है कि कोई सही नहीं और गलत भी नहीं क्योंकि अपने आप को कभी कोई गलत मानता ही नहीं है।

दहेज कि प्रथा तो काफी आम है और जो लोग आजकल दहेज नहीं मांगते उम्मीद करते है कि शादी में बहुत अच्छे गिफ्ट्स मिले और बहुत अच्छी शादी हो ताकि सबको दिखा सके भले ही एक पिता इसके लिए अपनी सारी जमा पूंजी ही ना लगा दे।

आज भी हमारे समाज में इतनी कुरीतियों और अन्धविश्वास को जगह मिली है कि लोग जादू टोना जैसी चीजों पे विश्वास करते है। नींबू मिर्च लगाना हो या फिर बिल्ली का रास्ता काटना हम सब मानते आए हैं।

जिस देश में देवी की पूजा होती है वहां पुजारिन काम दिखते है। लक्ष्मी घरेलू हिंसा कि शिकार है तो सरस्वती को पढ़ने नहीं दिया जाता। कितने घरों में आज भी औरतों का काम पे जाना गलत माना जाता है। आए दिन न्यूज में छोटे बच्चो के साथ हुए रेप की घटनाओं को पढ़ते है।

ऐसे बहुत से मुद्दे है जिनसे हमें आजादी आज तक नहीं मिली है मैंने तो संक्षेप में अपनी बात रखी हैं।

हमें कब सही मायनों में आज़ादी मिलेगी?